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राजस्थान में महिला सरपंच का ख़याल करते ही घूंघट काढ़े सहमी सी, अनपढ़ या अल्पशिक्षित महिला की छवि उभरती थी, पर छवि राजावत अलग ही तरह की सरपंच हैं. वे एमबीए हैं, लाखों की नौकरी छोड़कर गाँव में आई हैं, राजस्थानी के साथ ही अंग्रेज़ी भी बोलती हैं, घुड़सवारी भी करती हैं। मॉडर्न ख्याल, टेक्नॉलॉजी-सेवी, शेक्सपीयर से लेकर होटल मैनेजमेंट तक पर बहस कर सकनेवाली छवि ग्राम पंचायत से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक में बैठकों में गाँव के हालात पर बोलती हैं तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है. उनसे मिलने 19 नवम्बर को यूएसए के सबसे बड़े प्रांत वर्जिनिया की प्रथम महिला नागरिक डॉर्थी मैक कॉलिंस शिष्टमंडल के साथ आई थीं.

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छवि राजावत जयपुर से 60 किलोमीटर दूर टोंक जिले के सोड़ा गाँव की पांच साल से सरपंच हैं। उनका लक्ष्य है अपनी ग्राम पंचायत के सभी लोगों के लिए साफ़ पेयजल, सड़क, बिजली शौचालय और रोजगार मुहैया करना. फरवरी 2010 में ग्राम पंचायत का चुनाव लड़ने के पहले छवि ने लाखों के टेलीकॉम कंपनी के जॉब को छोड़ा और अपने गाँव आकर पर्चा भरा. सरपंच का पद महिला आरक्षण कोटे में आने के बाद दर्जनभर से ज्यादा महिलायें दावा कर रही थीं, लेकिन छवि के पर्चा भरते ही केवल दो दावेदार बचीं. छवि के चुनाव ने यह बात गलत साबित की कि पंचायत चुनाव में जाति या धर्म का कोई रोल होता है. छवि को जिताने के लिए लोगों ने जाति, धर्म, क्षेत्र, जेंडर और यहाँ तक कि रिश्तेदारी तक को भूलकर वोटिंग की. छवि ने विकास के परंपरागत तरीकों के साथ ही अनेक एनजीओ और कार्पोरेट्स भी छवि की मदद करने में जुट गए. विकास में तेजी भी आई.

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(दादा सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर रघुवीर सिंह राजावत के साथ छवि की पुरानी तस्वीर)

सरपंच पद संभालते ही छवि टीवी चैनलों के लिए भी आकर्षण बन गयीं. फेसबुक पर छवि के सैकड़ों प्रशंसकों ने उनके काम को सराहा. अनेक एनजीओ मदद की पहल करने लगे. कोई माँ उनसे बायोडाटा मांगने लगी कि मेरी बेटी आप पर निबंध लिखना चाहती है तो कोई उन्हें कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनने की जिद करता है, कोई मिलने का वक्त चाहता है तो कोई उन पर डाक्युमेंटरी बनने की तमन्ना रखता है. एक साल में ही छवि आइकॉन बन गई. लोग कहते हैं कि आप को गाँव की औरतों के साथ घुलना मिलना पसंद कैसे आता है? इस पर छवि का जवाब होता है मैं भी इसी गाँव की बेटी हूँ, ये सब मेरी बचपन की सहेलियां हैं. मुझे पढ़ाई के लिए अच्छा मौका मिला गया, बस.

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छवि फौजियों के खानदान की हैं. उनके पिता को छोड़ दादा, परदादा, चाचा, बाबा सब फ़ौज में रहे. दादा रघुवीर सिंह ब्रिगेडियर थे. रिटायर होकर सोडा गाँव आ गए और गाँव का नक्शा बदलने में जुटे. लगातार तीन बार सरपंच चुने गए. छवि के परदादा सेना में कर्नल थे और आजाद भारत में सोडा के पहले सरपंच बने थे. दादा की जिद पर छवि को नो एक्जाम,नो यूनीफार्म वाले ऋषि वैली स्कूल भेजा गया, फिर अजमेर के मेयो और फिर दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज. पुणे के बालाजी मैनेजमेंट संस्थान से एमबीए के बाद छवि जयपुर में अपनी माँ के पास (जिनका अपना होटल बिजनेस है) आयीं थीं कि सोडा के लोग बस में भरकर आ गए और उनसे सरपंच का चुनाव लड़ने की मांग करने लगे. गांववालों के आगे तो छवि को झुकना पड़ा लेकिन अपने काम और इरादों से छवि ने पूरी दुनिया को अपने आगे झुका दिया है.

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लोकप्रिय टीवी धारावाहिक 'बालिका वधु' की आनंदी का सरपंच वाला कैरेक्टर कुछ सीमा तक छवि राजावत से प्रेरित होकर लिखा गया था। हो सकता है रामगोपाल वर्मा जैसा कोई फ़िल्मकार उन पर फिल्म भी बना दे।

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